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अमेरिका की हो रही थी किरकिरी

अमेरिका की हो रही थी किरकिरी

अमेरिका की हो रही थी किरकिरी

अजीत डोभाल ने फिर किया कमाल, चीन-पाकिस्तान के बाद अमेरिका में भी मनवाया अपना लोहा

अजीत डोभाल (Ajit Doval) देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं. पर सुरक्षा मामलों से इतर भी वो अब देश और सरकार के लिए ट्रबलशूटर बनकर उभरे हैं.

संयम श्रीवास्तव

पिछले करीब पांच दिनों से भारतीय मीडिया और सोशल मीडिया पर अमेरिकी प्रशासन को काफी कुछ सुनने को मिल रहा था. जो बाइडेन और कमला हैरिस की अमेरिकी सरकार को भारत में बनने वाली वैक्सिन के लिए रॉ मटिरियल न उपलब्ध करवाने के लिए भारत और अमेरिका ही नहीं पूरे विश्व से लोग आवाज उठा रहे थे पर अमेरिकी प्रशासन टस से मस नहीं हो रहा था. इधर भारत का “सुपर अंडरकवर एजेंट” अपना काम कर रहा था. अचानक शनिवार शाम को खबर आती है कि भारत के एनएसए अजीत डोभाल की अमेरिकी काउंटरपार्ट से बात हुई है और अमेरिका वैक्सिन के रॉ मटिरियल भारत को देने के लिए राजी हो गया है. दरअसल जब दो देशों के एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट या हेल्थ संबंधी समस्याओं पर बात करने के लिए दोनों देशों के सुरक्षा सलाहकार जुट रहे हों तो जनता कयास लगाएगी ही. हम समझ सकते हैं कि उस शख्स में कुछ अलग तो है जो सरकार हर संकट में उसे आगे कर देती है और वो हर मौके पर खरा उतरता है. इन्हें ऐसे ही नहीं नरेंद्र मोदी का संकटमोचक कहा जाता है. दरअसल देश जब भी किसी मुसीबत में होता है अजीत डोभाल उस मुसीबत से निकलने का कोई ना कोई रास्ता निकाल ही लेते हैं.

दरअसल भारत की कंपनियां पिछले काफी समय से वैक्सीन बनाने में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों के न मिलने से परेशान थीं. जिसकी वजह से वैक्सीन के प्रोडक्शन में काफी कमी देखी जा रही थी. जब किसी से इसका हल नहीं निकला तब पीएम मोदी ने देश को इस परेशानी से निकालने के लिए अजीत डोभाल को इसका जिम्मा सौंपा और डोभाल हर बार की तरह इस बार भी 100 फ़ीसदी खरे उतरे. अजीत डोभाल ने अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन से इस मुद्दे पर क्या बातचीत कर उन्हें भारत को रॉ मटिरियल एक्सपोर्ट करने के लिए तैयार कर लिया ये तो वही जानते हैं पर इतना तय है कि यह आसान नहीं था. अमेरिका यह जानता है कि जब उनका देश कोरोनावायरस की पहली लहर के चपेट में था तब किस तरह से भारत ने एचसीक्यू दवा भेजकर मदद की थी.
अमेरिका की हो रही थी किरकिरी
अमेरिका के मान जाने के पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि जब से अमेरिका ने वैक्सीन निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के निर्यात पर रोक लगाई थी तब से दुनिया भर में उसकी मुखालफत हो रही थी. जो बाइडेन के इस फैसले से पूरी दुनिया में अमेरिका के नए-नए बने राष्ट्रपति जो बाइडेन की खूब किरकिरी हो रही थी. दरअसल भारत में बनने वाली वैक्सीन केवल भारतीयों को ही नहीं बल्कि दुनिया भर के कई देशों को दी जानी है. इस वजह से जब वैक्सीन के निर्माण में परेशानी आने लगी तब इसका सामना भारत के साथ-साथ कई देशों को करना पड़ा.
मदद को तैयार अमेरिका
हालांकि, अब अमेरिका ने भारत को मदद देने की बात की है. उसने कहा है कि वह भारत को कोविशील्ड वैक्सीन बनाने में जिन आवश्यक वस्तुओं की जरूरत होगी वह उसे पूरा करेगा. इसके साथ अमेरिका भारत को रैपिड डायग्नोसिस टेस्ट किट, वेंटिलेटर, पीपीई किट इत्यादि वस्तुएं भी उपलब्ध कराएगा जिससे यहां के फ्रंटलाइन वर्कर्स को सुरक्षा मुहैया कराया जा सके. इसके साथ भारत के लिए एक और खुशखबरी यह है कि बहुत जल्द भारत को ग्लोबल फंड से आर्थिक मदद मिलेगी, जिससे देश को कोरोना से निपटने में आसानी होगी. इसके साथ ही ‘यूएस चेंबर एंड कॉमर्स’ ने भी व्हाइट हाउस से भारत की मदद करने के लिए कहा है. उसने कहा कि यूएस के स्टॉक में 40 मिलियन एस्ट्रेजनेका वैक्सीन उपलब्ध है जिसका इस्तेमाल अमेरिका में नहीं किया जा रहा है अगर इसे भारत को दे दिया जाए तो इससे भारत की मदद होगी. यह सब कुछ आज इसलिए हो पा रहा है क्योंकि अजीत डोभाल ने अपनी सूझबूझ और कूटनीति से ऐसा माहौल तैयार किया कि अमेरिका जैसे देश को भी भारत की बात माननी पड़ी. विदेशी मामलों के जानकार पत्रकार हरीश तिवारी बताते हैं कि जब से अमेरिका में नई सरकार बनी है, केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार आने वाली समस्याओं को लेकर एक्टिव है. क्योंकि ट्रंप और बाइडेन की नीतियों में अतंर है, लिहाजा इसे भारत सरकार के लिए बड़ी कामयाबी माना जा रहा है. तिवारी कहते हैं कि भारत के लिए अमेरिका के साथ संबंध को नए तरीके से परिभाषित करना है और अपनी नीतियों में बदलाव करना है. शायद यही कारण है कि अजीत डोभाल जैसे विश्वसनीय व्यक्ति को मिशन अमेरिका के लिए लगाया गया है.
कौन हैं भारत के एनएसए अजीत डोभाल
20 जनवरी 1945 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में जन्म लेने वाले अजीत डोभाल अजमेर के मिलिट्री स्कूल से पढ़े हैं. इसके बाद उन्होंने इकोनॉमिक्स में आगरा विश्वविद्यालय से मास्टर की डिग्री भी ली है. अजीत डोभाल आज राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुछ सबसे खास विश्वसनीय लोगों में से एक हैं. भारत की मौजूदा सुरक्षा नीतियों में अजीत डोभाल का बड़ा हाथ है. पाकिस्तान को दुनिया भर में आतंकवाद के नाम पर अलग-थलग करने में डोभाल की कूटनीति बेहद कारगर साबित हुई थी. यही वजह है कि पाकिस्तान आज मुस्लिम देशों के संगठन को ओआईसी में भी बिल्कुल अकेला पड़ चुका है. अजीत डोभाल केरल कैडर के 1968 बैच के आईपीएस ऑफिसर हैं. उन्होंने 1972 तक बतौर आईपीएस ऑफिसर काम किया और उसके बाद इंटेलिजेंस ब्यूरो चले गए. वहां उन्होंने एक के बाद एक कई खुफिया मिशन को अंजाम दिया. अजीत डोभाल ने अंडरकवर एजेंट के रूप में भी कई बार काम किया है.
चीन पर भी भारी पड़े थे अजीत डोभाल
भारतीय सेना और चीनी सैनिकों के बीच बीते वक्त में काफी संघर्ष देखना पड़ा था. हालांकि अब भारत और चीन दोनों देश की सेनाएं पैंगोंग झील क्षेत्र के उत्तरी और दक्षिणी हिस्से से पीछे हट गई हैं. लेकिन इस संघर्ष में कई भारतीय सैनिक शहीद हुए थे. हालांकि, भारतीय वीरों ने कई चीनी सैनिकों को भी ढेर कर दिया था. माना जाता है कि चीन बैकफुट पर इसलिए आया क्योंकि भारतीय सेना ने पैंगोंग झील के दक्षिणी हिस्से में ऊंचाई वाले भागों पर कब्जा कर लिया था. जिस वजह से चीनी सैनिकों को पीछे हटना पड़ा. दरअसल भारत की इस रणनीति के पीछे देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का हाथ था. अजीत डोभाल ने ही सुझाया था कि भारत को रेजांग ला, रेचन ला, हेल्मेट टॉप और अकी ला सहित दक्षिणी हिस्से की ऊंचाइयों पर कब्जा कर लेना चाहिए. चीन को बातचीत के रास्ते पर लाने का यही एक रास्ता था. भारतीय सेना ने ऐसा ही किया और यह रणनीति पूरी तरह से काम कर गई.

भारत के ऐसा करने से चीन पर काफी दबाव बढ़ा और चीन ने बातचीत का रास्ता अपनाना ही उचित समझा. हालांकि इसमें वायु सेना की भी काफी अहम भूमिका थी. एयर चीफ मार्शल आरकेएस भदौरिया ने उत्तरी सीमा क्षेत्र में चीनी खतरे का सामना करने के लिए भारतीय वायु सेना को एकदम तैयार रखा था. भारतीय वायु सेना के आक्रामक रूप कर देख कर चीन पीछे हटने पर मजबूर हो गया था. जब चीन से पूर्वी लद्दाख में गतिरोध चल रहा था, उस वक्त सीडीएस जनरल रावत वायु सेना प्रमुख और थल सेना अध्यक्ष चीनी सेना का मुकाबला करने के लिए पूरी तरह से तैयार थे. भारतीय सेना ने अपनी आक्रामकता से अपने विस्तार वादी पड़ोसी को यह साफ संदेश दे दिया था कि भारत किसी भी कीमत पर पीछे नहीं हटेगा.

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