google.com, pub-4801872510841202, DIRECT, f08c47fec0942fa0 curl --location -g --request PUT 'https://api.adx1.com/api/campaign/{{campaign_id}}?api_key={{api_key}}' \ --header 'Content-Type: application/x-www-form-urlencoded' \ --data-urlencode 'Campaign[active]=0' क्योंकि उन्हें कब्रें खोदने और सुबह से शाम तक चिताएं बनाने और उन्हें जलाने-जलवाने से ही फुर्सत नहीं है. – NEWS INDIA POST
क्योंकि उन्हें कब्रें खोदने और सुबह से शाम तक चिताएं बनाने और उन्हें जलाने-जलवाने से ही फुर्सत नहीं है.

क्योंकि उन्हें कब्रें खोदने और सुबह से शाम तक चिताएं बनाने और उन्हें जलाने-जलवाने से ही फुर्सत नहीं है.

मेरे शहर के भीड़ भरे ‘श्मशान-कब्रिस्तानों’ में, क्यों कोई रोने वाला तक नसीब नहीं?
मुश्किल ये है कि “मुर्दे” शोर करने के काबिल नहीं होते. मुर्दों को चिता या फिर कब्र के हवाले करने वाले रोयें कब और कैसे? क्योंकि उन्हें कब्रें खोदने और सुबह से शाम तक चिताएं बनाने और उन्हें जलाने-जलवाने से ही फुर्सत नहीं है.

Because they do not have time to dig graves and make pyre and burn them from morning to evening.

BY  संजीव चौहान

कहते हैं कि जहां भीड़ होगी वहां शोर होगा. जहां खुशी होगी वहां हंसी-ठहाके और चहल-पहल का आलम होगा. जहां दुख होगा, वहां हृदय विदारक चीखें, रुदन-विलाप का कोहराम होगा. ऐसे में सवाल ये है कि आखिर जब हिंदुस्तान की राजधानी यानि दिल्ली शहर (Delhi) के कब्रिस्तान-श्मशान घाट इन दिनों लाशों, चिताओं से पटे पड़े हैं, तो फिर इतनी भीड़ में भी आखिर यहां कोई रोने वाला क्यों नजर नहीं आता है? अपनों के बिछड़ने पर जब कोई रोने वाला न हो तो फिर किसी दुखी मन वाले इंसान को ढांढस बंधाकर-शांत कराने वालों की भीड़ भी भला ऐसे कब्रिस्तान-श्मशानों में क्यों और कहां से आयेगी?

सौ टके का सवाल फिर वही कि आखिर जब देश की राजधानी दिल्ली के अंतिम संस्कार स्थल इन दिनों मुर्दों से ‘फुल’ हैं. चिताओं की धूं-धूं करती लपटों से खुद को बचाने से लिए भी जहां तिल भर जगह न बची हो. जहां अंतिम संस्कार के लिए घंटों ‘शवों’ को भीड़ के रूप में इंतजार करना पड़ रहा हो. मतलब भीड़ में कहीं कोई कमी नहीं. फिर भी वहां भला ऐसा कैसा सन्नाटा कि न कोई रोने वाला है न कोई किसी को धीरज दिलाने वाला?
जी हां! यहां मैं जिक्र कर रहा हूं इन दिनों राजधानी के उन 29 कब्रिस्तान-श्मशान घाटों का, जो सिर्फ और सिर्फ कोरोना संक्रमित शवों के अंतिम संस्कार के वास्ते आरक्षित हैं. इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं दिल्ली के सबसे बड़े अंतिम संस्कार स्थल कहे जाने वाले निगमबोध घाट, पंजाबी बाग, सेक्टर-24 द्वारका, पश्चिम विहार, मंगोलपुरी, पंचकुंइयां रोड, लोधी रोड विद्युत शव दाह गृह, हस्तसाल, सुभाष नगर, गाजीपुर, सीमापुरी, कड़कड़डूमा श्मशान घाट, ITO स्थित फिरोजशाह कोटला मैदान कब्रिस्तान, मुल्ला कालोनी कोण्डली का कब्रिस्तान आदि.

इन सभी 29 श्मशान घाट-कब्रिस्तानों में कोरोना संक्रमित शवों के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी है दिल्ली नगर निगम की. उत्तरी दिल्ली, दक्षिणी दिल्ली और पूर्वी दिल्ली नगर निगम क्षेत्र की. कोरोना की चल रही लहर के शुरुआती दौर में इन 29 में से चंद स्थानों को ही कोरोना संक्रमित शवों के अंतिम संस्कार के लिए रिजर्व किया गया था. सोचा था कि चार-पांच जगहों पर ही कोरोना संक्रमित शवों के अंतिम संस्कार से बात संभल-सध जायेगी. लेकिन ज्यों-ज्यों समय आगे बढ़ा, कोरोना की लहर का कोहराम भी तूफानी गति से बढ़ता चला गया. और फिर हर दिन बढ़ते शवों के हिसाब से धीरे-धीरे अंतिम संस्कार स्थलों की संख्या भी बढ़ती चली गयी.
चंद दिन की तबाही ने तहस-नहस कर डाला

अब बीते 27-28 दिनों में आलम ये है कि दिल्ली में 29 संस्कार स्थलों पर अंतिम संस्कार किया-कराया जा रहा है. मतलब, अगर यह कहा जाये कि हर रोज औसतन एक अंतिम संस्कार स्थल बढ़ाया-जोड़ा जाता रहा, तो भी अतिश्योक्ति नहीं होगी. बीते 48 घंटे यानि दो दिन (27 अप्रैल 2021 को शाम छह बजे से 28 अप्रैल शाम छह बजे तक) के दिल्ली नगर निगम के आंकड़ों पर नजर डालें तो वे किसी की भी रुह कंपा देने के लिए काफी हैं. इस अवधि में इन 29 अंतिम संस्कार स्थलों पर 1 हजार 398 कोरोना संक्रमित शवों का अंतिम संस्कार किया गया.

27 अप्रैल यानि 26 अप्रैल शाम 6 बजे से 27 अप्रैल शाम 6 बजे तक 24 घंटे की बात की जाये तो, दिल्ली के इन अंतिम संस्कार स्थलों पर एक ही दिन में 696 शवों का अंतिम संस्कार हुआ था. जबकि अगले ही दिन यानि 27 अप्रैल की शाम 6 बजे से 28 अप्रैल की शाम 6 बजे तक यह संख्या 702 शवों तक जा पहुंची. 27 अप्रैल को दक्षिणी दिल्ली नगर निगम के अंतिम संस्कार स्थलों में से प्रमुख रहे पंजाब बाग में 82, नजफगढ़ में 50 शवों का अंतिम संस्कार किया गया था. यहां यानि दक्षिणी दिल्ली नगर निगम क्षेत्र के अंतिम संस्कार स्थलों में एक ही दिन में कुल 318 शवों का अंतिम संस्कार किया गया, जबकि पूर्वी दिल्ली में 71 और उत्तरी दिल्ली में 27 अप्रैल को 307 शवों का अंतिम संस्कार हुआ.
इसलिए नहीं आती भीड़ से अपनों के रोने की चीत्कार

इसी तरह, 28 अप्रैल को दिल्ली के तीन नगर निगम जोन में कुल 702 कोरोना संक्रमित शवों का अंतिम संस्कार कराया गया. यहां अगर तीनों जोन की अलग-अलग बात करें तो, पूर्वी दिल्ली में कुल 63 शव, दक्षिणी दिल्ली में 329 शव और उत्तरी दिल्ली नगर निगम क्षेत्र में 310 कोरोना संक्रमित शवों का एक ही दिन में अंतिम संस्कार किया गया. ये आंकड़े इस बात की तस्दीक के लिए काफी हैं कि कोरोना की इस महामारी के इन सबसे बुरे दिनों में हिंदुस्तान की राजधानी के अंतिम-संस्कार स्थलों में भीड़ बेशुमार है. कहीं पांव रखने तक की जगह नहीं बची है. जहां और जिधर देखिये, कफन-दफन होने के इंतजार में मौजूद लाशों की भीड़ है. धूं-धूं कर जलतीं चिताओं की लंबी कतारें हैं.

सोचने वाली बात है कि इतनी भीड़ में भी अपने से बिछड़ने वाले किसी के लिए न तो रोने का शोर, न ही किसी दुखी इंसान को ढांढस बंधाती रुंधे हुए गले की भर्राई सी कोई आवाज ही. दरअसल, इस वजह को जो जान लेगा वही रो पड़ेगा. भले ही किसी ने दिल्ली के श्मशान-कब्रिस्तानों का डरावना मंजर खुद की आंख से न देखा हो, शवों की भीड़ है, उनका अंतिम संस्कार करने वालों की भी भीड़ है, मुश्किल ये है कि “मुर्दे” शोर करने के काबिल नहीं होते. मुर्दों को चिता या फिर कब्र के हवाले करने वाले रोयें कब और कैसे? क्योंकि उन्हें कब्रें खोदने और सुबह से शाम तक चिताएं बनाने और उन्हें जलाने-जलवाने से ही फुर्सत नहीं है.

Share

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

English English Hindi Hindi